यूपीएससी की प्रेरणा ख़त्म हो रही है? हार मानने वाले दिनों के लिए असली कहानियाँ
अगर रात के 1 बजे दूसरे टैब में आधा पॉलिटी चैप्टर खोलकर यह पढ़ रहे हैं, तो नमस्ते। यह आपके लिए है।
आँकड़े से शुरू करते हैं, क्योंकि वह आपको पता है और अनजान बनना अपमान होगा। 2025 के चक्र में करीब 9.4 लाख लोगों ने आवेदन किया, करीब 5.8 लाख ने प्रीलिम्स दिया, और 958 की सिफ़ारिश हुई। किसी भी तरह देखिए, इस परीक्षा को देने वाले ज़्यादातर गंभीर और मेहनती लोग इसे पास नहीं कर पाते।
तो अगर थक गए हैं, तो आपमें कोई ख़राबी नहीं है। यह परीक्षा लोगों को थका देती है, और यह सामान्य प्रतिक्रिया है।
वे लोग जो चलते रहे
साइट पर ऐसी बहुत-सी कहानियाँ हैं। मुश्किल हफ़्ते में किसी दोस्त को ये भेजने लायक हैं।
मनोज कुमार शर्मा। फ़िल्म शायद देखी होगी। मुरैना में बारहवीं में फ़ेल, टेंपो चलाया, दिल्ली की सड़कों पर रातें, लाइब्रेरी में काम, ₹400 महीने में कुत्ते घुमाए, और आख़िरी प्रयास में परीक्षा पास। आख़िरी प्रयास। उस दबाव को सोचिए।
उम्मुल खेर। हड्डियों की कमज़ोरी की बीमारी के साथ पैदा हुईं, 16 फ़्रैक्चर और 8 सर्जरी झेलीं। आठवीं के बाद पढ़ाई जारी रखने के लिए अकेले रहने लगीं, और दिल्ली की झुग्गी में ₹100 की ट्यूशन से अपना ख़र्च चलाया। ऑल इंडिया रैंक 420।
प्रांजल पाटिल। छह साल की उम्र तक आँखों की रोशनी चली गई, फिर स्क्रीन-रीडिंग सॉफ़्टवेयर से तेज़ गति पर यूपीएससी की किताबें सुनीं। परीक्षा दो बार पास की।
गोविंद जायसवाल। वाराणसी के रिक्शा चलाने वाले के बेटे, जिन्होंने जनरेटर के शोर वाले कमरे में ईयरप्लग लगाकर पढ़ाई की। उनके पिता ने इसके लिए अपनी आख़िरी ज़मीन बेच दी। यह बात दिल में रह जाती है।
रिंकू सिंह राही। यूपी में प्रांतीय अधिकारी थे जब छात्रवृत्ति घोटाला उजागर किया और सात गोलियाँ लगीं। एक आँख की रोशनी गई। फिर भी यूपीएससी पास किया।
एक चेतावनी भी। यह पढ़कर यह मत सोचिए कि "उनकी हालत तो मुझसे बुरी थी, मुझे बुरा लगने का हक़ नहीं"। ये कहानियाँ इसके लिए नहीं हैं। आपकी थकान असली है, चाहे किसी ने आप पर गोली न चलाई हो। बात यह है कि जो पहुँचे, वे भी तैयारी के हर दिन अतिमानव नहीं थे। कोई नहीं होता।
और वे लोग जिन्होंने दूसरा रास्ता लिया
यह हिस्सा कोचिंग संस्थान अपने होर्डिंग पर नहीं लगाते।
अनुभव दुबे से यूपीएससी पास नहीं हुआ। दोस्तों के साथ इंदौर में कुल्हड़ चाय का छोटा सड़क किनारे का कियोस्क खोला, और आज चाय सुट्टा बार के 400 से ज़्यादा आउटलेट हैं।
ख़ान सर की अपनी नाकामी एनडीए के फ़िज़िकल टेस्ट में थी, और फिर पटना में अभ्यर्थियों के छोटे बैच पढ़ाना शुरू हुआ। आज वे देश के सबसे जाने-माने शिक्षकों में हैं। फिर रोमन सैनी हैं, जो 22 में चुने गए, और फिर इस्तीफ़ा देकर वह शुरू करने में लगे जो आगे अनएकेडमी बना। यानी सेवा का रास्ता सिर्फ़ सेवा की नौकरी से होकर नहीं जाता।
इस परीक्षा के लिए जो सीखा है, वह आपका ही रहेगा। आप मुश्किल रिपोर्ट पढ़ सकते हैं, दबाव में साफ़ उत्तर लिख सकते हैं, और आपको अंदाज़ा है कि सरकार असल में कैसे चलती है। बहुत-से नियोक्ता इसकी कद्र करेंगे, और सूची में नाम न आने से यह ग़ायब नहीं होगा।
इस हफ़्ते के लिए तीन काम
दो रात पूरी नींद लीजिए। चार घंटे की नींद पर ख़राब मॉक और ख़राब मूड दोनों और बुरे लगते हैं।
प्लान बी लिखिए, तारीख़ के साथ। तय कीजिए कि और कितने प्रयास, और उसके बाद क्या। बहुत-से अभ्यर्थी इससे बचते हैं क्योंकि यह हार जैसा लगता है। अक्सर उल्टा होता है। बैकअप होने पर यह प्रयास ज़िंदगी-मौत का सवाल नहीं लगता, और परीक्षा हॉल में दिमाग़ चल पाता है।
किसी ऐसे इंसान से बात कीजिए जो तैयारी नहीं कर रहा। अभ्यर्थियों के समूह बहुत अच्छे भी हैं और बिल्कुल पागल भी। बाहर का दोस्त याद दिलाएगा कि एक दुनिया है जहाँ किसी को नहीं पता कि CSAT क्या होता है। अगर बात थकान से आगे बढ़ गई है और ज़्यादातर दिन उम्मीद नहीं दिखती, तो कृपया डॉक्टर, काउंसलर या किसी भरोसे के इंसान से बात कीजिए। यह किसी भी प्रयास से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है।
फिर जब तैयार हों, वह पॉलिटी चैप्टर दोबारा खोल लीजिए। वह वहीं मिलेगा।
अगर यहाँ की कोई कहानी काम आई हो, तो तैयारी कर रहे किसी और को भेज दीजिए। शायद उनका भी हफ़्ता मुश्किल चल रहा हो।